Wednesday, March 27, 2019



"वटवृक्ष बनो..."

कभी आपने लोगों को कहते हुए सुना होगा "उस व्यक्ति से मिलकर अच्छा लगा" "उसके साथ समय कैसे बीता, पता ही नहीं चला"
"वह इंसान नहीं, अनमोल हीरा है"

हम कोशिश करें कि जीते जी ऐसे लोगों के व्यवहार की गुत्थी सुलझा लें। जिस व्यक्ति से जो अच्छा लगे, उसेे उसी दिन अपना लें।

ढूंढना, ऐसे लोग आपके आस-पास मिल जायेंगे।

ऐसे लोगों का हास्य सहज होता है। मुस्कुराहट प्राकृतिक होती है। वे दूसरों को तसल्ली से सुनते हैं। उनकी बातों में 'मैं' तत्व होता ही नहीं है। वे क्षमा करने और मांगने में देर नहीं लगाते। उनका शिकायती व्यवहार नहीं होता है। उनके गुणों के बाहुल्य के कारण अवगुण छुप से जाते हैं। वे छोटी बड़ी समस्याओं से विचलित नहीं होते है।

वे इस सांसारिक अरण्य में विशाल वटवृक्ष है जिसकी ऊपर जाती हर शाख जमीन से जुड़े रहने का प्रयत्न करती है। जिसको कुविचारों की तीव्रतम आंधी हिला ही नहीं सकती। जिसकी हर कोटर में जीवन का संगीत गुंजायमान है। उनकी गहरी जडें कुछ गहरा ढूंढकर लाती है और वो गहराई ही लोगों को भा जाती है। उस पर कुल्हाड़ी चलाने के लिए अतिमानवीय साहस चाहिए। तेजस्वी सूरज भी उसके रहस्यों को किरणों से भेद नहीं पाता। आस पास सब कुछ सूखते उजड़ते आप देखोगे लेकिन कोसों दूर से दिखता ये वटवृक्ष राहगीरों की रोचक दंतकथाओं का हिस्सा रहता है।

शब्द शिल्प:

डॉ अर्जुन सिंह साँखला
प्राचार्य, लक्की इन्सटिट्यूट अॉफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।

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