"जिंदगी कुछ ऐसी हो..."
जिन्दगी आपके लिए रोज गुलाब का फूल लेकर खड़ी नहीं होगी। रोज आपकी राह में कांटे भी बिखरे नहीं होंगे। जिंदगी इतनी कठिन नहीं है जितना हम इसे बना देते हैं और इतनी सरल भी नहीं है जितना हम इसे समझ लेते हैं।
पर हाँ, हमने अपने बारे में कोई गलतफहमी पाल रखी है या दूसरे लोग हमें हमारी क्षमता से कम आंकते है तो एक काम करना।
एक बाल्टी पानी लेना। उसमें अपना हाथ डाल कर पानी में एक लहर वाली उथल फुथल पैदा करना। थोड़ी और लहरें पैदा करना। फिर दफ़अतन अपना हाथ बाहर निकाल देना। रफ्ता रफ्ता पानी शांत हो जायेगा। एकदम शांत।
मित्र, पूरे जुनून से पानी में हलचल पैदा करो। अपने अस्तित्व का एहसास दुनिया को पूरे दम से कराओ।
आपके हाथ के निकलने के चंद पलों बाद पानी एकदम शांत हो जाएगा। कोई उस पानी को देखकर यह नहीं कह पायेगा की किसी के हाथ ने यहाँ जल उत्प्लावन किया था। हमारे अस्तित्व का घमंड यहीं पर चूर चूर होता है। यह सबक हमें जीवन भर नहीं भूलना चाहिए।
लेकिन उस जल में जब भी हलचल करने की बारी जब थी, तब हलचल ऐसी करनी थी कि उस पल को दुनिया सूरज के अस्तित्व तक भूल नहीं पाये।
कर्म बड़े है, हम नहीं।
शब्द शिल्प:
डॉ अर्जुन सिंह साँखला
प्राचार्य, लक्की इन्सटिट्यूट अॉफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।
जिन्दगी आपके लिए रोज गुलाब का फूल लेकर खड़ी नहीं होगी। रोज आपकी राह में कांटे भी बिखरे नहीं होंगे। जिंदगी इतनी कठिन नहीं है जितना हम इसे बना देते हैं और इतनी सरल भी नहीं है जितना हम इसे समझ लेते हैं।
पर हाँ, हमने अपने बारे में कोई गलतफहमी पाल रखी है या दूसरे लोग हमें हमारी क्षमता से कम आंकते है तो एक काम करना।
एक बाल्टी पानी लेना। उसमें अपना हाथ डाल कर पानी में एक लहर वाली उथल फुथल पैदा करना। थोड़ी और लहरें पैदा करना। फिर दफ़अतन अपना हाथ बाहर निकाल देना। रफ्ता रफ्ता पानी शांत हो जायेगा। एकदम शांत।
मित्र, पूरे जुनून से पानी में हलचल पैदा करो। अपने अस्तित्व का एहसास दुनिया को पूरे दम से कराओ।
आपके हाथ के निकलने के चंद पलों बाद पानी एकदम शांत हो जाएगा। कोई उस पानी को देखकर यह नहीं कह पायेगा की किसी के हाथ ने यहाँ जल उत्प्लावन किया था। हमारे अस्तित्व का घमंड यहीं पर चूर चूर होता है। यह सबक हमें जीवन भर नहीं भूलना चाहिए।
लेकिन उस जल में जब भी हलचल करने की बारी जब थी, तब हलचल ऐसी करनी थी कि उस पल को दुनिया सूरज के अस्तित्व तक भूल नहीं पाये।
कर्म बड़े है, हम नहीं।
शब्द शिल्प:
डॉ अर्जुन सिंह साँखला
प्राचार्य, लक्की इन्सटिट्यूट अॉफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।
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