"आज वो शुभ दिन है..."
जिन्दगी में सब कुछ मन माफ़िक नहीं हो रहा है? अगर समस्या इतनी ही है तो परेशान न हो; यह दुनिया की सबसे आम समस्या है। अब आप की ख्वाहिश है कि सब कुछ आपके मन मुताबिक हो।
'सब कुछ' आपके मुताबिक वाला स्वप्न तो तुरन्त छोड़ दीजिए, पर 'बहुत कुछ' आपके मुताबिक जरूर हो सकता है।
रिहायशी इलाके में लगी आग को बुझाने में जो तत्परता और साहस इंसान दिखाता है, वो हमारी रोमावली खड़ी कर देता है। जिन्दगी जिन्दादिली से जीने के सारे राज़ जिन्दगी में ही छुपे हैं।
उस 'बहुत कुछ' के लिए अपने भीतर की आग की तपन को महसूस करो। वह आग अगर धौंकनी से तपे रक्तवर्ण के लोहे जैसी है तो किसी की भी बुरी नज़र, कसमसाहट, कुलबुलाहट आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। आपकी जीत पर आँख मीच कर दांव खेला जा सकता है।
पर हमारी इच्छाएं अगर गुनगुने पानी की तरह है तो आप एक घंटा तो इसमें बिता देंगे कि 'यह पहनूं' या 'वो पहनूं'।
भीतर के रोजमर्रा के ज्वार-भाटे को सुनामी बनाओ। धौंकनी को और तेज चलाओ। आधी से ज्यादा छुटकर समस्याएं तो आप के तेजस्वी रूप को देखकर दूसरा घर ढूंढने के लिए भाग जाएगी।
बात पर यकीन करना। उस आग को जलाने के लिए आज सबसे शुभ दिन है।
शब्द शिल्प:
डॉ अर्जुन सिंह साँखला
प्राचार्य, लक्की इन्सटिट्यूट अॉफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।
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