Wednesday, March 27, 2019



"कुछ हीरे ऐसे भी..."

जीवन में किसी मुकाम पर आपकी ज़िंदगी में ऐसा पल अवश्य आया होगा, जब आप किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए या आपको लगा अब आप हार जायेंगे।

ये वो पल है जहाँ हालात आप को 'तोड़' देंगे या कोई बड़ी उपलब्धि के लिए 'मोड़' देंगे।

बस इतना ध्यान रखना...

अपने ऊपर विश्वास बनाये रखो।अन्तिम विकल्प तक डटे रहो। सहानुभूति देने आने वालों से पूरी मुस्कान के साथ मिलो। उनको भनक दे दो कि आप तकलीफ में है ही नहीं। हिम्मत बंधाने वाला आये तो आपको देखकर थोड़ी हिम्मत वो आप से ले जाये। किसी आक्रोशित बैल की राह में खड़े मासूम बच्चे को आप जिस तत्परता से लपक कर बचा लेते है उसी तरीके से चलते समय में से एक पल को लपक लीजिए।

ये वो पल है जिसमें आप अपने में स्थापित हो चुके हो। कष्ट अब केवल अभ्यास के लिए हैं। कान अब खुद की आवाज ही सुनते हैं। जुबान के लिए विश्राम का समय है। फड़कती बाजुओं को धड़कती इच्छाओं से वाकिफ़ कराओ।

मन में घोषणा करो कि आज यहाँ कोई मील का पत्थर गड़ेगा या ये सड़क सूरज के सामने पिघल जाने वाले डामर के लिए कुख्यात होगी।

सारे 'हीरे' खदानों में ही नहीं होते हैं।

शब्द शिल्प:


"वटवृक्ष बनो..."

कभी आपने लोगों को कहते हुए सुना होगा "उस व्यक्ति से मिलकर अच्छा लगा" "उसके साथ समय कैसे बीता, पता ही नहीं चला"
"वह इंसान नहीं, अनमोल हीरा है"

हम कोशिश करें कि जीते जी ऐसे लोगों के व्यवहार की गुत्थी सुलझा लें। जिस व्यक्ति से जो अच्छा लगे, उसेे उसी दिन अपना लें।

ढूंढना, ऐसे लोग आपके आस-पास मिल जायेंगे।

ऐसे लोगों का हास्य सहज होता है। मुस्कुराहट प्राकृतिक होती है। वे दूसरों को तसल्ली से सुनते हैं। उनकी बातों में 'मैं' तत्व होता ही नहीं है। वे क्षमा करने और मांगने में देर नहीं लगाते। उनका शिकायती व्यवहार नहीं होता है। उनके गुणों के बाहुल्य के कारण अवगुण छुप से जाते हैं। वे छोटी बड़ी समस्याओं से विचलित नहीं होते है।

वे इस सांसारिक अरण्य में विशाल वटवृक्ष है जिसकी ऊपर जाती हर शाख जमीन से जुड़े रहने का प्रयत्न करती है। जिसको कुविचारों की तीव्रतम आंधी हिला ही नहीं सकती। जिसकी हर कोटर में जीवन का संगीत गुंजायमान है। उनकी गहरी जडें कुछ गहरा ढूंढकर लाती है और वो गहराई ही लोगों को भा जाती है। उस पर कुल्हाड़ी चलाने के लिए अतिमानवीय साहस चाहिए। तेजस्वी सूरज भी उसके रहस्यों को किरणों से भेद नहीं पाता। आस पास सब कुछ सूखते उजड़ते आप देखोगे लेकिन कोसों दूर से दिखता ये वटवृक्ष राहगीरों की रोचक दंतकथाओं का हिस्सा रहता है।

शब्द शिल्प:

डॉ अर्जुन सिंह साँखला
प्राचार्य, लक्की इन्सटिट्यूट अॉफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।


"रंग जमा दें..."

जीवन के इस रंगमंच पर आपकी भूमिका पर लोगों की नज़र है। हज़ारों चेहरों की रंगत निखरती है जब आप अपनी किसी ख़ुसूसियत से लोगों के दिल में उतर जाते है।

अधूरी इच्छाओं से रंगमंच पर उतरना न था और जब उतर गए हो तो दर्शकों पर नशा बन कर छा जाओ। मेले की भीड़ का आकर्षण सबसे ऊंचा झूला बनना है तो चक्कर भी बड़ा लगाना होगा और ताकत भी ज्यादा।

"सब मुझे ही देख रहे है, पता नहीं क्या होगा" के बजाय " सब मुझे ही देख रहे है, मुझे पता है क्या करना है" वाले वाक्य पर ध्यान दो। अपने दिल की धड़कनों को नियन्त्रित कर कर ही आप दूसरों की धड़कनों में बस सकते हो। याद रखें, लोग दो दो आँखों से आप को देख रहे है, अपना शहंशाही रोल अदा करते समय तलवार ढीली नहीं पकड़ें। जिस पांडाल में सूत्रधार को तालियां बजवाने के लिए नहीं बल्कि रुकवाने के लिए कहना पड़े समझ लो आपका रंग जम गया है।

चेहरे से होली का रंग उतारते वक्त जरा गौर करना कि ये रंग आप क्यों उतार रहे है। शायद इसलिए कि आपका मनचीता रोल कुछ और है और ये रंग उसके लिए मुनासिब नहीं।आप के चेहरे पर जिस दिन वो मनचीता रंग चढ़ जायेगा, उस दिन आप उस रंग पर नाज़ करेंगे। दुनिया भी उस रंग में रंगने के लिए बेताब हो जायेगी।

हंसी ठिठौली में एक दूसरे को रंगें जीवन का पूरा आंनद लें लेकिन अपनी जिंदगी को रंगने वाले रंगरेज़ आप है और कूँची भी आपके हाथ में है।


शब्द शिल्प:

डॉ अर्जुन सिंह साँखला
प्राचार्य, लक्की इन्सटिट्यूट अॉफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।


"उसी क्षण जुट जाओ..."

बड़ी प्राकृतिक आपदाओं और विश्वयुद्धों में मानवता को नुकसान पहुंचा है परन्तु महत्वपूर्ण कार्यों को टालने की प्रवृत्तियों ने मानव सभ्यता को सबसे बड़ा नुकसान पहुंचाया है।

"इसकी तैयारी अगले माह शुरु करूँगा/करूंगी"।
"बस ये सर्दी कम हो जाये फिर मॉर्निंग वॉक पर जाऊँगा/जाऊँगी"

इस तरह के न जाने कितने कारणों और बहानों ने किसी उपयोगी और बहुमूल्य काम को अटकाया है। जिस क्षण कोई सुविचार आपके मस्तिष्क में आया है, वह अद्वितीय क्षण है। तत्क्षण काम में जुट जाने की प्रवृत्ति बहुत गिने चुने लोगों में हैं। अगर आप उन गिने चुने लोगों में से एक है तो अपने हस्ताक्षर सुडौल करने का अभ्यास कर लें क्योंकि बहुत जल्दी आपके साथ सेल्फी खींचने की होड़ मच सकती है और हस्ताक्षर देने पड़ सकते है।

हमारी प्रकृति के बादल, हवाएँ, वर्षा, ऋतुएँ, धूप आदि कुछ भी रुकता नहीं है। पांच तत्वों से बने शरीर में भी श्रेष्ठ कार्यों को टालने की आदत घातक है।

जनवरी में कोई ख़याल दिमाग में आया था और अप्रैल में काम में लगे हो तो आप उन लोगों से जीवन भर दो महीने पीछे ही रहोगे जिन्होंने दो महीनों का भरपूर उपयोग लिया है।

दो ओवर लगातार खाली निकल जाए तो टीम की साँसें अटक जाती है। हर ओवर में कुछ न कुछ अर्जित करें। कुम्भकर्णी नींद में से उठकर आप छः बॉल में छः छक्के लगा देंगें ऐसा सैंकड़ों सालों में एक बार होता है।

वास्तविक बनें।
फंतासी संसार में न जीए।

शब्द शिल्प:

डॉ अर्जुन सिंह साँखला
प्राचार्य, लक्की इन्सटिट्यूट अॉफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।


"क्या हम प्रोफेशनल है ?..."

प्रश्न को तीन कसौटियों पर कस कर देखतें है।

एक: क्या हम टी वी के उन पाँच चैनल्स के नाम जानते है जो हमें अपने सपनों के करीब लाते है?क्या आपको गली में बज रहे ढोल बाजों से दुःखी होने के बजाय उसमें संभावित जीत की थिरकन महसूस होती है? आपकी सुबह और शाम की ऊर्जा में ज्यादा अन्तर नहीं है? आपके कार्यस्थल से आपको बेहद लगाव है? 
उत्तर 'हाँ' है और दुनिया आपके काम की तारीफ करती है तो लगे रहो। आप कहीं भी बिना लड़े आधा युद्ध जीतने की काबिलियत रखतें हैं।

दो: आपके ग्राहक की मुलाजिमत करते वक्त आपके चेहरे की मुस्कान पल भर न गई और ग्राहक के सारे प्रश्न खत्म हो गए।  आप एक मुकम्मल प्रोफेशनल है। आपकी कर्मस्थली की आधी भौतिक सम्पदा आप का ज्ञान है।

तीन: आपके बोल में डमरू सा सम्मोहन है, आपका व्यवहार बसंत की शीतल बयार है, आप धैर्यवान है, लोग आपके साथ-साथ चलने को तैयार है क्योंकि आप छाते की तरह सबका आतप हर लेते है। आप दुनिया के किसी कोने में खड़े है, आधी जनसंख्या चुटकी बजाते ही आपके पाले में खड़ी हो जायेगी।

कसौटी पर कसना कभी।


शब्द शिल्प:

डॉ अर्जुन सिंह साँखला
प्राचार्य, लक्की इन्सटिट्यूट अॉफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।


"आज वो शुभ दिन है..."

जिन्दगी में सब कुछ मन माफ़िक नहीं हो रहा है? अगर समस्या इतनी ही है तो परेशान न हो; यह दुनिया की सबसे आम समस्या है। अब आप की ख्वाहिश है कि सब कुछ आपके मन मुताबिक हो।

'सब कुछ' आपके मुताबिक वाला स्वप्न तो तुरन्त छोड़ दीजिए, पर 'बहुत कुछ' आपके मुताबिक जरूर हो सकता है।

रिहायशी इलाके में लगी आग को बुझाने में जो तत्परता और साहस इंसान दिखाता है, वो हमारी रोमावली खड़ी कर देता है। जिन्दगी जिन्दादिली से जीने के सारे राज़ जिन्दगी में ही छुपे हैं।

उस 'बहुत कुछ' के लिए अपने भीतर की आग की तपन को महसूस करो। वह आग अगर धौंकनी से तपे रक्तवर्ण के लोहे जैसी है तो किसी की भी बुरी नज़र, कसमसाहट, कुलबुलाहट आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। आपकी जीत पर आँख मीच कर दांव खेला जा सकता है।

पर हमारी इच्छाएं अगर गुनगुने पानी की तरह है तो आप एक घंटा तो इसमें बिता देंगे कि 'यह पहनूं' या 'वो पहनूं'।

भीतर के रोजमर्रा के ज्वार-भाटे को सुनामी बनाओ। धौंकनी को और तेज चलाओ। आधी से ज्यादा छुटकर समस्याएं तो आप के तेजस्वी रूप को देखकर दूसरा घर ढूंढने के लिए भाग जाएगी।

बात पर यकीन करना। उस आग को जलाने के लिए आज सबसे शुभ दिन है।

शब्द शिल्प:

डॉ अर्जुन सिंह साँखला
प्राचार्य, लक्की इन्सटिट्यूट अॉफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।
"जिंदगी कुछ ऐसी हो..."

जिन्दगी आपके लिए रोज गुलाब का फूल लेकर खड़ी नहीं होगी। रोज आपकी राह में कांटे भी बिखरे नहीं होंगे। जिंदगी इतनी कठिन नहीं है जितना हम इसे बना देते हैं और इतनी सरल भी नहीं है जितना हम इसे समझ लेते हैं।

पर हाँ, हमने अपने बारे में कोई गलतफहमी पाल रखी है या दूसरे लोग हमें हमारी क्षमता से कम आंकते है तो एक काम करना।

एक बाल्टी पानी लेना। उसमें अपना हाथ डाल कर पानी में एक लहर वाली उथल फुथल पैदा करना। थोड़ी और लहरें पैदा करना। फिर दफ़अतन अपना हाथ बाहर निकाल देना। रफ्ता रफ्ता पानी शांत हो जायेगा। एकदम शांत।

मित्र, पूरे जुनून से पानी में हलचल पैदा करो। अपने अस्तित्व का एहसास दुनिया को पूरे दम से कराओ।

आपके हाथ के निकलने के चंद पलों बाद पानी एकदम शांत हो जाएगा। कोई उस पानी को देखकर यह नहीं कह पायेगा की किसी के हाथ ने यहाँ जल उत्प्लावन किया था। हमारे अस्तित्व का घमंड यहीं पर चूर चूर होता है। यह सबक हमें जीवन भर नहीं भूलना चाहिए।

लेकिन उस जल में जब भी हलचल करने की बारी जब थी, तब हलचल ऐसी करनी थी कि उस पल को दुनिया सूरज के अस्तित्व तक भूल नहीं पाये।

कर्म बड़े है, हम नहीं।


शब्द शिल्प:

डॉ अर्जुन सिंह साँखला
प्राचार्य, लक्की इन्सटिट्यूट अॉफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।