"रंग जमा दें..."
जीवन के इस रंगमंच पर आपकी भूमिका पर लोगों की नज़र है। हज़ारों चेहरों की रंगत निखरती है जब आप अपनी किसी ख़ुसूसियत से लोगों के दिल में उतर जाते है।
अधूरी इच्छाओं से रंगमंच पर उतरना न था और जब उतर गए हो तो दर्शकों पर नशा बन कर छा जाओ। मेले की भीड़ का आकर्षण सबसे ऊंचा झूला बनना है तो चक्कर भी बड़ा लगाना होगा और ताकत भी ज्यादा।
"सब मुझे ही देख रहे है, पता नहीं क्या होगा" के बजाय " सब मुझे ही देख रहे है, मुझे पता है क्या करना है" वाले वाक्य पर ध्यान दो। अपने दिल की धड़कनों को नियन्त्रित कर कर ही आप दूसरों की धड़कनों में बस सकते हो। याद रखें, लोग दो दो आँखों से आप को देख रहे है, अपना शहंशाही रोल अदा करते समय तलवार ढीली नहीं पकड़ें। जिस पांडाल में सूत्रधार को तालियां बजवाने के लिए नहीं बल्कि रुकवाने के लिए कहना पड़े समझ लो आपका रंग जम गया है।
चेहरे से होली का रंग उतारते वक्त जरा गौर करना कि ये रंग आप क्यों उतार रहे है। शायद इसलिए कि आपका मनचीता रोल कुछ और है और ये रंग उसके लिए मुनासिब नहीं।आप के चेहरे पर जिस दिन वो मनचीता रंग चढ़ जायेगा, उस दिन आप उस रंग पर नाज़ करेंगे। दुनिया भी उस रंग में रंगने के लिए बेताब हो जायेगी।
हंसी ठिठौली में एक दूसरे को रंगें जीवन का पूरा आंनद लें लेकिन अपनी जिंदगी को रंगने वाले रंगरेज़ आप है और कूँची भी आपके हाथ में है।
शब्द शिल्प:
डॉ अर्जुन सिंह साँखला
प्राचार्य, लक्की इन्सटिट्यूट अॉफ प्रोफेशनल स्टडीज, जोधपुर।
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